ज्वालामुखी शक्तिपीठ / jvaalaamukhee shaktipeeth | जहां पर अकबर को भी झुकना पड़ा था

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ज्वालामुखी शक्तिपीठ / jvaalaamukhee shaktipeeth | जहां पर अकबर को भी झुकना पड़ा था

मां ज्वाला जी मंदिर बहुत ही प्राचीन मंदिर है, जो कि कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी शहर में हिमाचल प्रदेश तथा हिमालय के निचले क्षेत्र में स्थित है ,ज्वाला जी का मंदिर माता ज्वाला जी जिन्हें ज्वाला देवी जी के नाम से भी जाना जाता है को समर्पित है, ज्वाला माता जी का मंदिर धर्मशाला से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, प्राचीन ग्रंथों और ज्योतिषियों के आधार पर ऐसा माना जाता है के इस मंदिर में माता ज्योति रूप में विराजमान है और इसी ज्योति के आगे शहंशाह अकबर को भी झुकना पड़ा था , उनके अहंकार को ज्वाला माता जी ने चूर चूर किया अहंकार टूटने के बाद शहंशाह अकबर ने माता के आगे नतमस्तक होकर नमस्कार किया, और माता जी को एक सोने का छत्तर भी चढ़ाया, जिसके बारे में एक अलग से कहानी विख्यात है|
ज्वालामुखी शक्तिपीठ / jvaalaamukhee shaktipeeth | जहां पर अकबर को भी झुकना पड़ा था
ज्वालामुखी शक्तिपीठ / jvaalaamukhee shaktipeeth | जहां पर अकबर को भी झुकना पड़ा था

जब शहंशाह अकबर को भी माता के दरबार में झुकना पड़ा था 

 शहंशाह अकबर के सिपाहियों ने जब ध्यानू भगत जी को माता ज्वाला जी के मंदिर में पूजा अर्चना करते हुए देखा, तो उन्होंने ध्यानू भगत जी से माता के अद्भुत रूप के बारे में जानने की कोशिश की तब ध्यानू भगत जी ने ज्वाला माता जी को भगवान रूपी दर्जा देते हुए जगत जननी बताया और ठीक वैसे ही शहंशाह अकबर के सिपाहियों ने अपने शहंशाह को माता ज्वाला जी के बारे में बताया, परंतु शहंशाह अकबर शहंशाह के साथ साथ अहंकारी भी थे, उन्होंने माता की परीक्षा लेनी चाही इसके चलते उन्होंने अपने सिपाहियों से मंदिर में जल रही ज्योति को बुझाने के लिए कहा , लाख कोशिशों के बाद भी जब मंदिर में जल रही ज्योतियां नहीं बुझी तब शहंशाह अकबर माता के दरबार में नतमस्तक हो गए, और उन्होंने सोने का छत्र चढ़ाया जो आज भी ज्वाला जी में देखा जा सकता है परंतु माता ज्वाला जी ने शहंशाह अकबर के इस अहंकारी तोहफे को कबूल नहीं किया शहंशाह अकबर के हाथों से वह सोने का छत्र नीचे धरती पर गिर गया और किसी अलग धातु में परिवर्तित हो गया|

ज्वाला जी आज भी कर रही हैं अपने  भक्त का इंतजार

गुरु गोरखनाथ माता ज्वाला जी के बहुत बड़े भक्त थे,  ग्रंथों और ज्योतिषियों के आधार पर ऐसा कहा जाता है , के एक बार गुरु गोरखनाथ जी को भूख लगी और उन्होंने ज्वाला माता जी को भोजन पकाने के लिए अग्नि जलाने को कहा और खुद दीक्षा लेने चले गए जाते जाते उन्होंने माता जी से यह कहा कि जब तक वह भिक्षा लेकर वापस नहीं आते तब तक आप उनका इंतजार करिए और अग्नि को जलाए रखें ऐसी मान्यता है के ज्वाला माता जी आज भी अपने  भक्त गोरखनाथ जी के इंतजार में ज्योति रूप अग्नि को जलाए हुए हैं ऐसा कहा जाता है के गुरु गोरखनाथ कलयुग के अंत में भिक्षा लेकर आएंगे और अपनी माता ज्वाला जी के हाथों से भोजन प्राप्त करके कृतार्थ होंगे|

माता सती की जिह्वा गिरने के कारण यह स्थान ज्वाला जी के नाम से प्रसिद्ध हुआ

 ज्वाला जी में माता सती की जिह्वा गिरी थी , इसीलिए इस स्थान को ज्वाला जी के नाम से जाना जाता है लगातार इस स्थान पर माता की नौ ज्योतियां लगातार बिना किसी भी बाती के जल रही हैं यहां धरती से अलग-अलग जगहों में ज्वालाए निकल रही हैं जिनकी गिनती नो है ऐसी मान्यता है के इन अलग-अलग ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा ,चंडी ,हिंगलाज ,विंध्यवासिनी ,महालक्ष्मी ,सरस्वती ,अंबिका ,अंजी देवी के नाम से जाना जाता है यह  स्थान शक्तिपीठों में गिना जाता है माता की जिह्वा गिरने के कारण यह स्थान शक्तिपीठों में आता है कहते हैं जहां जहां माता सती के अंग गिरे थे वह स्थान अलग अलग शक्तिपीठों में गिने जाते हैं ज्वालाजी इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है|

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